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Thread: नर हो न निराश करो मन को - मैथिलीशरण गुप्त

          
   
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    नर हो न निराश करो मन को - मैथिलीशरण गुप्त

    नर हो न निराश करो मन को

    नर हो न निराश करो मन को
    कुछ काम करो कुछ काम करो
    जग में रहके निज नाम करो
    यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
    समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
    कुछ तो उपयुक्त करो तन को
    नर हो न निराश करो मन को ।

    संभलो कि सुयोग न जाए चला
    कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
    समझो जग को न निरा सपना
    पथ आप प्रशस्त करो अपना
    अखिलेश्वर है अवलम्बन को
    नर हो न निराश करो मन को ।

    जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
    फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
    तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
    उठके अमरत्व विधान करो
    दवरूप रहो भव कानन को
    नर हो न निराश करो मन को ।

    निज गौरव का नित ज्ञान रहे
    हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
    सब जाय अभी पर मान रहे
    मरणोत्तर गुंजित गान रहे
    कुछ हो न तजो निज साधन को
    नर हो न निराश करो मन को ।




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    Last edited by Manav; 29th September 2012 at 03:38.

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